Navratri History: नवरात्रि की शुरुआत कब और कहाँ से हुई थी? जानिए इसका प्राचीन इतिहास और पौराणिक कथा
आरंभ और तिथियां: शारदीय नवरात्रि की शुरुआत आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होती है, जिसमें नौ दिनों तक माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की उपासना की जाती है।
शारदीय नवरात्रि की शुरुआत पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है।
इतिहास और पौराणिक पृष्ठभूमि (History of Navratri)
नवरात्रि के इतिहास और इसकी शुरुआत से जुड़ी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
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पौराणिक कथा (महिषासुर वध): पौराणिक ग्रंथों (जैसे देवी महात्म्यम् या दुर्गा सप्तशती) के अनुसार, प्राचीन काल में महिषासुर नाम के राक्षस ने अपने अत्याचारों से तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। तब सभी देवताओं ने मिलकर अपनी सम्मिलित ऊर्जा से माँ शक्ति (देवी दुर्गा) का आह्वान किया। देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच लगातार नौ दिनों और रातों तक भीषण युद्ध चला और दसवें दिन माँ ने उसका वध कर दिया। तभी से बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में यह उत्सव मनाया जाता है।
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भगवान राम द्वारा शुरुआत: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान श्री राम ने रावण पर विजय प्राप्त करने से पहले समुद्र तट पर शक्ति की देवी माँ दुर्गा की नौ दिनों तक आराधना (पूजा) की थी। इसके बाद दसवें दिन विजयादशमी (दशहरा) मनाई गई।
सबसे पहले कहाँ मनाया गया था?
नवरात्रि या शक्ति की आराधना का इतिहास किसी एक विशेष स्थान या शहर से बंधा हुआ नहीं है, क्योंकि यह प्राचीन सनातन संस्कृति और वैदिक काल से जुड़ी परंपरा है।
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ऐतिहासिक प्रमाण: ऐतिहासिक और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, शारदीय नवरात्रि सार्वजनिक रूप से सबसे पहले शरद ऋतु (कटाई के मौसम) के दौरान उत्तर और पश्चिमी भारत में कृषि और शक्ति साधना के रूप में मनाई जानी शुरू हुई थी।
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पहला बड़ा सार्वजनिक आयोजन: ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, बंगाल क्षेत्र में सार्वजनिक रूप से माँ दुर्गा की पूजा (जिसे आज 'दुर्गा पूजा' या बंगाल का सार्वजनिकोत्सव कहा जाता है) की शुरुआत का श्रेय राजा मानसिंह (मुगल काल के दौरान 16वीं शताब्दी में बंगाल के गवर्नर) या उससे भी पहले के स्थानीय राजवंशों को जाता है, जिन्होंने पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर या मालदा क्षेत्रों में पहली बार बड़े पैमाने पर इसका आयोजन किया था। इसके बाद धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे भारत में फैल गई।
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