भाद्रपद पूर्णिमा 26 को:सुबह करें देवी-देवताओं की पूजा, दोपहर में पितरों के लिए धूप-ध्यान, जानिए पितृ पक्ष से जुड़ी मान्यताएं

Sep 25, 2026 - 04:45
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भाद्रपद पूर्णिमा 26 को:सुबह करें देवी-देवताओं की पूजा, दोपहर में पितरों के लिए धूप-ध्यान, जानिए पितृ पक्ष से जुड़ी मान्यताएं
कल (शनिवार, 26 सितंबर) भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि है। इस पूर्णिमा का विशेष महत्व माना गया है, क्योंकि इसी दिन से पितृ देव को याद करने का उत्सव पितृ पक्ष शुरू होता है। इस दिनों में पूर्वजों की आत्म शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और धूप-ध्यान जैसे धर्म-कर्म किए जाते हैं। पितृ पक्ष का समापन सर्वपितृ मोक्ष (10 अक्टूबर) अमावस्या पर होता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार, भाद्रपद पूर्णिमा के दिन सुबह देवी-देवताओं की पूजा करें, जबकि दोपहर में पितरों का स्मरण करते हुए उनके निमित्त धूप-ध्यान और श्राद्ध कर्म करें। पितरों से जुड़े कर्मों के लिए दोपहर का समय विशेष माना गया है। करीब 12 बजे के आसपास पितरों को याद करके उनके लिए श्रद्धापूर्वक धर्म-कर्म किए जाते हैं। भाद्रपद पूर्णिमा पर उन मृत लोगों का श्राद्ध विशेष रूप से किया जाता है, जिनका निधन किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को हुआ हो। पितृपक्ष के दिनों में मांसाहार, नशे और क्रोध से दूर रहने की सलाह दी जाती है। घर में बेवजह विवाद या क्लेश न हो, इस बात का ध्यान रखना चाहिए। मान्यता है कि इन दिनों में शांत और संयमित व्यवहार रखना चाहिए। भाद्रपद पूर्णिमा के दिन देवी-देवताओं की पूजा के साथ दान-पुण्य करने की परंपरा है। तीर्थ दर्शन और पवित्र नदी में स्नान को भी शुभ माना जाता है। यदि किसी कारण नदी या तीर्थ स्थान पर जाना संभव न हो, तो घर पर स्नान करते समय पवित्र नदियों का ध्यान किया जा सकता है। पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। पूर्णिमा पर भगवान सत्यनारायण की कथा सुनने और पढ़ने की भी परंपरा है। सत्यनारायण कथा व्यक्ति को सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। परिवार के सदस्य मिलकर कथा पढ़ते-सुनते हैं। पितृपक्ष शुरू होने के बाद रोज सुबह देवी-देवताओं की पूजा करने की परंपरा है। इसके साथ सूर्य देव को तांबे के लोटे से जल अर्पित किया जा सकता है। जल चढ़ाते समय ‘ॐ सूर्याय नमः’ मंत्र का जाप करने की परंपरा भी बताई गई है। मान्यता है कि नियमित पूजा और सूर्य उपासना से सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में अनुशासन बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है। पितृपक्ष के दिनों में ग्रंथों का पाठ भी किया जाता है। घर में गरुड़ पुराण और श्रीमद्भागवत कथा का पाठ कराने की परंपरा भी है। पितरों का स्मरण केवल श्राद्ध के कर्म तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी इसका एक महत्वपूर्ण भाव है। पितृपक्ष में अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद लोगों की सहायता करना चाहिए। इस दौरान अनाज, कपड़े, धन और जूते-चप्पल जैसी उपयोगी वस्तुओं का दान किया जा सकता है। किसी जरूरतमंद व्यक्ति की आवश्यकता पूरी करना भी सेवा का एक अच्छा माध्यम माना जाता है। इसके अलावा गोसेवा की परंपरा भी पितृपक्ष से जुड़ी हुई है। श्रद्धालु किसी गोशाला में हरी घास या अन्य उपयोगी सामग्री दान कर सकते हैं।

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