जाने गणपति पूजन का शुरुवात कब से हुई , क्या है इसका इतिहास
इस लेख के लिए एसईओ-फ्रेंडली (SEO-Friendly) Summary (निष्कर्ष/सारांश) और Meta Description: Meta Description (सर्च इंजन और सोशल मीडिया शेयरिंग के लिए): जानें गणपति पूजन की शुरुआत कब और कैसे हुई? छत्रपति शिवाजी महाराज से लेकर 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरू किए गए सार्वजनिक गणेशोत्सव का पूरा इतिहास और इसका धार्मिक व राष्ट्रीय महत्व।
गणेश पूजन भारत में प्राचीन काल (सातवाहन, राष्ट्रकूट और चालुक्य राजवंशों के समय) से चला आ रहा है। हालांकि, इसे एक बड़े उत्सव का रूप देने के दो मुख्य पड़ाव हैं:
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छत्रपति शिवाजी महाराज का काल (17वीं शताब्दी):
महाराष्ट्र में राष्ट्रभक्ति और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने शासनकाल में सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव का आयोजन शुरू कराया था। बाद में पेशवाओं ने भी गणपति को अपने कुलदेवता के रूप में पूजा और पुणे में धूमधाम से गणेश उत्सव मनाया।
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लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा पुनरुत्थान (1893):
अंग्रेजी शासन के दौरान अंग्रेजों ने भारतीयों के एक जगह एकत्र होने और किसी भी राजनीतिक सभा पर रोक लगा दी थी।
सन 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने घरेलू स्तर पर मनाए जाने वाले इस त्योहार को सार्वजनिक गणेशोत्सव (सामूहिक उत्सव) का रूप दिया। इसके मुख्य उद्देश्य थे:
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अंग्रेजों के नियम को चकमा देकर लोगों को एक मंच पर इकट्ठा करना।
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जात-पात के भेदभाव को मिटाकर समाज में एकता लाना।
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स्वतंत्रता संग्राम के लिए लोगों में देशभक्ति की भावना जगाना।
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यह त्योहार 10 दिनों तक चलता है और अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है:
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स्थापना: गणेश चतुर्थी के दिन घरों और पंडालों में मिट्टी की गणेश प्रतिमा स्थापित की जाती है।
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पूजा-अर्चना: 10 दिनों तक मंत्रोच्चार, आरती और मोदक (गणपति का प्रिय भोग) अर्पित करके पूजा की जाती है।
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विसर्जन: अनंत चतुर्दशी के दिन गाजे-बाजे के साथ प्रतिमाओं को जल में विसर्जित किया जाता है, जिसका अर्थ है कि गणेश जी अपने लोक लौट रहे हैं और अगले वर्ष फिर आने का वादा करते हैं।
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